फ़िर ना मिलेगा यह एकांतकर सेवन रहकर निर्भ्रान्त !कहाँ फ़िर मन अंतर्मुख होगाबस दृष्टि में यह सुख होगाबैठो क्षण भर हो कर शान्तफिर ना मिलेगा यह एकांत....आपाधापी हर पल होगीतुम्हें व्यस्तता केवल होगीफ़िर दौड़ेंगे सब होकर भ्रान्तफिर ना मिलेगा यह एकांत....श्रेष्ठ कर्म आत्म का चिंतनस्व के सम्मुख स्व का दर्शनक्यों चिन्ता से मन हो क्लान्तफिर ना मिलेगा यह एकांत....जो सच की रखवाली होगीतभी यहाँ खुशहाली होगीउन्नत होगा देश व प्रान्तफिर ना मिलेगा यह एकांत....डॉ. सुरेश नायक
कृतज्ञ हूँ !
---------------------
कृतज्ञ हूँ !
जीने को मिले
एक और दिन के लिए
प्राप्त और पर्याप्त की
जुगलबंदी के लिए
प्रतिक्रिया किसलिए करूँ
प्रतिक्षण
अभिभूत हूँ
जिसे
प्रसाद और परीक्षा
सब स्वीकार हो
उसके ह्रदय
आभार
क्यों न बारम्बार हो!
-डॉ. सुरेश नायक